मतसा (ज़मानियाँ)। ढ़़ढ़नी ग्राम मे आयोजित हनुमान जयंती के अवसर पर रामकथा सुनाते हुए मानस मंजरी विभा उपाध्याय ने के कथा के दूसरे दिन कहाँ की जब तक हनुमान जी की प्रशंसा अनेक उपाधियों के द्वारा जामवंत जी ने किया तब तक हनुमान जी सिर नीचे किये बैठे रहे कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं किया परन्तु ज्यों ही यह कहाँ की हे! हनुमान तुम्हारा अवतार ही भगवान राम के कार्य के लिए हुआ हैं फ़िर भी तुम चुपचाप कैसे बैठे हो।
जब हनुमानजी जी के कानों में यह शब्द पड़ा तो सुनते ही उनके शरीर मे अपूर्व बल तेज बढ़ गया और वह पर्वत की भांति सर ऊँचा कर पूरे जोश में आ गए और आगाध समुद्र को लांघने की पी जाने तथा त्रिकुट पर्वत पर स्थित लंका को ही समुद्र में डुबो देने का उत्साह व्यक्त करने लगे लेकिन जोश के साथ साथ होश को भी संभाले रखा जामन्वत जी से पूछा कि उपरोक्त सभी कुछ करने में मैं सक्षम हूं लेकिन मुझे क्या करना उचित हैं यह सलाह आप दीजिये यह प्रसंग हम सब को विशेष कर युवाओं को यह शिक्षा देता है की अपने पास क्षमता होते हुए भी अपनों से बड़ो माता-पिता और गुरु से समय समय पर सलाह लेकर ही कोई कार्य विशेष करना चाहिए। समारोह मे भागवताचार्य चन्द्रेश महाराज , कैलाश यादव, राधेश्याम चौबे, विनोद श्रीवास्तव ने कथा का अमृत पान कराया।
रिपोर्ट-सुशील कुमार गुप्ता