गाजीपुर| जिला कृषि अधिकारी ने बताया है कि वर्तमान समय में तापमान में तीव्र गिरावट तथा आर्द्रता में वृद्धि के कारण रबी फसलों में कीट एवं रोगों के प्रकोप की संभावना बढ़ गई है। ऐसे में किसानों के मध्य जागरूकता बढ़ाना एवं समय से बचाव उपाय लागू करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि गेहूँ में बीज को रोग रहित एवं रोग-रोधी प्रजातियों का उपयोग करना चाहिए। अनावृत कंडुआ एवं करनाल बंट की रोकथाम के लिए कार्बेन्डाजिम 50% WP अथवा कार्वेक्सिन 75% WP की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज शोधन अनिवार्य है। भूमिजनित रोगों से बचाव के लिए ट्राईकोडर्मा 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर को 60–75 किलोग्राम गोबर खाद में मिलाकर 8–10 दिन तक छाया में रखने के बाद अंतिम जुताई में खेत में मिलाना चाहिए। दीमक एवं गुजिया नियंत्रण हेतु व्युवेरिया बेसिआना 1.15% की 2.5 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर खाद के साथ मिलाकर प्रयोग करनी चाहिए, जबकि खड़ी फसल में क्लोरपाईरीफास 20% EC की 2.5 लीटर मात्रा को सिंचाई के पानी में मिलाकर उपयोग करना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए सल्फोसल्फ्यूरान, क्लोडिनाफाप-प्रोपेर्जिल, मेटसल्फ्यूरान मिथाइल तथा कारफेंट्राजॉन इथाइल जैसी अनुशंसित दवाओं का छिड़काव बुवाई के 20–25 दिन बाद करना उचित है।
मक्का फसल में तना बेधक कीट के प्रकोप की स्थिति में डाईमिथोएट 30% EC तथा नोवालुरोन + इमामेक्टिन बेन्जोएट का छिड़काव प्रभावी है। फॉल आर्मी वर्म से बचाव के लिए खेत में 20–25 पक्षी आश्रय, 3–4 प्रकाश प्रपंच एवं 35–40 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर स्थापित करना चाहिए। रासायनिक नियंत्रण के लिए ब्रोफ्लोनिलाइड एवं क्लोरेनट्रानिलीप्रोल का प्रयोग उपयुक्त है। सरसों एवं राई में बीजजनित रोगों से बचाव हेतु थिरम 75% एवं मेटालेक्सिल से बीज उपचार आवश्यक है। आरा मक्खी एवं पत्ती सुरंगक कीट के नियंत्रण के लिए डाईमिथोएट, क्यूनालफास एवं कार्बोफ्यूरान का प्रयोग करना चाहिए।
चना, मटर एवं मसूर में बीजजनित रोगों से बचाव के लिए ट्राईकोडर्मा तथा थिरम-कार्बेन्डाजिम मिश्रण से बीज उपचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। कटुआ कीट की रोकथाम के लिए मेटारेजियम एनिसोप्ली का उपयोग तथा आवश्यकता पड़ने पर क्लोरपाईरीफास 20% EC का छिड़काव किया जा सकता है। मटर की तना मक्खी एवं एस्कोकाईटा पत्ती धब्बा रोग के नियंत्रण हेतु लेम्बडा-साइहेलोथ्रिन, मेन्कोजेब एवं कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव किया जाना चाहिए। इसी प्रकार आलू में ब्लैक स्कर्फ रोग की रोकथाम हेतु प्रमाणित एवं रोग-रोधी बीजों का चयन महत्वपूर्ण है, साथ ही पेनफ्लूफेन या थाईफ्लूजामाइड से बीज उपचार कर बुवाई करनी चाहिए। जिला कृषि अधिकारी ने किसानों से अपील की है कि यदि उनकी फसल में किसी भी प्रकार की समस्या दिखाई दे तो वे सहभागी फसल निगरानी एवं निदान प्रणाली के नंबर 9452257111 एवं 9452247111 पर अपनी फसल का वीडियो या फोटो भेजकर त्वरित समाधान प्राप्त कर सकते हैं।