मलसा (गाजीपुर)। सोनवल ग्राम स्थित हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित सात दिवसीय संगीतमय रामकथा के विश्राम दिवस पर भागवताचार्य चंद्रेश महाराज ने कहा कि भगवान का अवतार विप्र धेनु सुर संत हित अवतार लेते हैं ऐसा शास्त्रों में उल्लेख किया गया और अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं।
जब असुर वृत्ति के लोग समाज में अनाचार, दुराचार के आचरण को प्रोत्साहित करते हैं और सदाचार, व्रत, पूजा, जप और यज्ञ इत्यादि धर्मानुकूल आचरण को हतोत्साहित करते हैं तब धराधाम पर संत और सज्जन लोग की रक्षा हेतु भगवान स्वयं किसी न किसी रूप में अवतरित होते हैं। कभी कभी अपने किसी भक्त के भाव की रक्षा हेतु भी भगवान का अवतार होता है। जब मनु सतरूपा ने कठोर तपस्या किया था और भगवान के प्रकट होने पर उनसे वरदान के रूप में भगवान को ही पुत्र रूप में पाने की इच्छा जताई तब भगवान ने उन्हें वचन दिया कि अगले जन्म में आप अयोध्या के राजा दशरथ के रूप में और यह आपकी पत्नी उस जन्म में कौशल्या नाम से जानी जाएगी तब आप लोगों के यहां पुत्र बनकर मैं उत्पन्न हूंगा।
महाराज जी ने आगे कहा कि सनातन संस्कृति में सोलह संस्कारों का जीवन में बड़ा महत्व और प्रभाव है।अब तो सोलह में से मुख्यतया तीन चार संस्कार यथा जन्म संस्कार, नामकरण,मुंडन, अन्नप्राशन, विवाह और दाहसंस्कार ही व्यवहार में रह गये हैं।नामकरण अपने कुलगुरू, बड़े बुजुर्ग की उपस्थिति में ही सम्पन्न होना चाहिए।नाम का व्यक्ति के जीवन में अत्यंत प्रभावी असर पड़ता है और यह नाम ही रह जाता है चाहे व्यक्ति का शरीर रहे या ना रहे। अयोध्या नरेश दशरथ के यहां भी जब ब्रह्म का अपने अंशों सहित नर रूप में अवतार हुआ तब उनका भी नामकरण क्रमशः राम,भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न हुआ।