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रेडियो का सुनहरा भविष्य: पारंपरिक माध्यम या आधुनिक तकनीक से तालमेल?

ब्यूरो 13-02-2025

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जमानियां(गाजीपुर)। डिजिटल क्रांति के इस दौर में जहां मनोरंजन के साधनों में भारी बदलाव आया है, वहीं रेडियो की संवेदनशीलता, स्वस्थ मनोरंजन और प्रामाणिक सूचना आज भी अद्वितीय बनी हुई है। जमानियां स्टेशन बाजार निवासी श्री सुरेश जायसवाल, जो पिछले 47 वर्षों से रेडियो के नियमित श्रोता हैं, इसका सजीव उदाहरण हैं।

रेडियो से अटूट जुड़ाव:
आकाशवाणी वाराणसी के ‘हेलो फरमाइश’ कार्यक्रम को ध्यानपूर्वक सुन रहे सुरेश जायसवाल से हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. अखिलेश कुमार शर्मा शास्त्री की वार्ता हुई। उस समय विविध भारती के इस कार्यक्रम में फिल्म अनोखी रात का गीत “मेरे बेरी का बेर मत तोड़ो कि कांटा चुभ जाएगा” बज रहा था, जिसने माहौल को संगीतमय बना दिया।रेडियो से जुड़ाव के बारे में बात करते हुए श्री जायसवाल ने बताया कि उन्होंने 1978 में हाई स्कूल के छात्र रहते हुए आकाशवाणी वाराणसी से जुड़ाव स्थापित किया और आज भी उसी ऊर्जा और उत्साह से रेडियो सुनते हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने आकाशवाणी वाराणसी के उद्घोषकों पंचदेव पांडेय, राधेश्याम श्रीवास्तव, गया प्रसाद शास्त्री, वीणा कालिया, मोहम्मद सलीम राही, शर्वेश दुबे, पुष्पा मिश्रा, किशोर कुमार, पांडुरंग पौराणिक सहित वर्तमान उद्घोषक अरुण पांडेय को अनगिनत बार सुना है।

रेडियो का ऐतिहासिक महत्व:

रेडियो का इतिहास अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक रहा है।1900 में जगदीश चंद्र बसु और गुल्येलेलमी मार्कोनी ने बेतार संदेश भेजने की शुरुआत की।24 दिसंबर 1906 को कनाडाई वैज्ञानिक रेगिनॉल्ड फेसंडेन ने पहली बार रेडियो प्रसारण किया।1936 में भारत में इंपिरियल रेडियो ऑफ इंडिया की स्थापना हुई, जो स्वतंत्रता के बाद ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) बन गया।

रेडियो के प्रति घटती रुचि पर चिंता:

श्री जायसवाल ने यह चिंता व्यक्त की कि नई पीढ़ी में रेडियो सुनने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे घट रही है। उनके अनुसार, रेडियो न केवल सुलभ और किफायती मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि यह मानवता, संस्कार और ज्ञानवर्धन का भी स्रोत है।बदलते समय ने लोगों को इंटरनेट से तो जोड़ा, लेकिन जितनी तेजी से मानवता का ह्रास हुआ है, रेडियो के जमाने में ऐसा नहीं था।

रेडियो बनाम डिजिटल युग:

हिंदी विभाग के सहायक आचार्य एवं मीडिया प्रभारी डॉ. अभिषेक तिवारी का मानना है कि रेडियो की भाषा, उच्चारण और संवेदनशीलता उसे अन्य माध्यमों से अलग बनाती है।आज डिजिटल युग में कंटेंट गंदा, भद्दा और अश्लील होता जा रहा है, जबकि रेडियो के ज़माने में लोग इसी माध्यम से शुद्ध हिंदी, सुसंस्कृत व्यवहार और उत्कृष्ट उच्चारण सीखते थे। जो बात रेडियो में थी, वो मोबाइल में कहां?

रेडियो के अमर कार्यक्रम:

श्री सुरेश जायसवाल ने बताया कि आकाशवाणी वाराणसी और अन्य केंद्रों द्वारा प्रस्तुत ‘गीतों भरी कहानी’, ‘मेरी पसंद’, ‘श्रोताओं से आमने-सामने’, ‘आज इतवार है’, ‘बाल संघ’, ‘युगवाणी’, ‘अंगनइयां’, ‘मंजुषा’, ‘आराधना’, ‘मानस गान’, ‘स्वास्थ्य चर्चा’ जैसे कार्यक्रम आज भी उनके प्रिय हैं।वे अभी भी वाराणसी, गोरखपुर, पटना, नजीबाबाद, अल्मोड़ा, देहरादून, सासाराम, अंबिकापुर, बिलासपुर, इंदौर और सूरतगढ़ जैसे आकाशवाणी केंद्रों से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं।

रेडियो का भविष्य:

भले ही आधुनिक तकनीक ने रेडियो की लोकप्रियता को चुनौती दी है, लेकिन इसकी विश्वसनीयता, सादगी और मनोरंजन के गुण आज भी इसे एक विशिष्ट स्थान प्रदान करते हैं। डिजिटल क्रांति के बावजूद, रेडियो अपने संतुलित, संवेदनशील और सशक्त प्रसारण के लिए सदैव लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाए रखेगा।

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