जमानियां। कहते हैं कि बच्चे भगवान के रूप होते हैं। ये अपने पास पड़ोस के बच्चों में घुलमिल कर अपना सामाजीकरण करते हैं। बच्चे समाज व्यवहार को समाज से ही सीखते हैं और सीखे व्यवहारों के अनुरूप सामाजिक बदलावों के साथ ताउम्र लाभान्वित होते हैं। लेकिन कोरोना महामारी ने अपने भय के आगोश में बड़े, बूढ़े, बुजुर्गों को तो लिया ही है मानसिक बदलाव के स्तर पर बच्चे भी इससे अछूते नहीं रह पाए।
मेरे महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ.अनिल कुमार सिंह के पौत्र वीर और कुश जिनकी वय लगभग 3 व 5 वर्ष की है अपने मित्र के साथ खेलने में मशगूल हैं। तय यह हुआ है कि कोई किसी को छुएगा नहीं,दौड़ भाग कर खेलेंगे। इसी बीच खेलते समय एक बच्चा गिर जाता है, उसके घुटने पर चोट आई है। वीर ने उसे उठाकर उसका घुटना सहलाया । कुश ने शिकायत की कि अरे छुओ मत, किसी को छूना नहीं है। सोशल डिस्टेंस जरूरी है,पर वीर का कहना था कि सोशल डिस्टेंस तो ठीक है पर क्या हमारी सोशल रेस्पान्सिबिलिटी नहीं बनती?बच्चों का यह वार्तालाप मिस्टर श्याम ने अभिभावकों तक पंहुचाया। दूसरी कहानी है सान्वी की जो बेहद संवेदनशील हैं उम्र से ज्यादा परिपक्व। पेंगुइन जेनी और एलीफेण्ट मारिस फ्रेंड हैं।टीचर मंकी ने जेनी को पनिश्मेंट दी है। मारिस को लगा कि फ्रेंड को सजा मिली तो उसे भी साथ देना चाहिए।सान्वी कहती हैं कि जेनी भी तो उसकी फ्रेंड है, तो वह भी सजा की लाइन में दीवार की तरफ मुंह कर सजा पाए साथियों के साथ लग गईं। इन दोनों घटनाओं में मानवीय जीवन मूल्यों और सामाजिक समरसता के दर्शन होते हैं,वह भी अबोध बच्चों के व्यवहार में।सृष्टि में जहां हम बचपन से ही मानव ही नहीं मानवेत्तर प्राणियों से लगाव रखते प्रकृति को अपना सहचर मानते थे।प्रकृति का साथ क्या छोड़ा हमने, जीवन शैली क्या बदली,सब कुछ बदल गया। कोरोना महामारी ने हमारे मनोसामाजिक सम्बन्धों पर प्रहार किया है। इस महामारी से मानव को कब और कैसे मुक्ति मिलेगी, महामारी के बाद का जीवन कैसा होगा, क्या बदलाव देखने को मिलेंगे मुस्कुराएगा इंडिया काउंसलर के रूप में तमाम कालर्स के कॉल्स के जवाब देकर उनको संतुष्ट करने वाले राष्ट्रीय सेवा योजना के वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी डॉ.अखिलेश कुमार शर्मा शास्त्री के पास इस यक्ष प्रश्न का जवाब नहीं है आगे की ईश्वर जानें?
