गाजीपुर। स्वामी सहजानंद स्नातकोत्तर महाविद्यालय में बुधवार को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के पांच वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में “राष्ट्रीय शिक्षा नीति: समस्याएँ और संभावनाएँ” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ और महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि हिंदू पी.जी. कॉलेज, जमानियां के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. राकेश सिंह रहे। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. वी.के. राय ने स्मृति चिन्ह भेंटकर उनका स्वागत एवं सम्मान किया।
अपने वक्तव्य में डॉ. सिंह ने कहा कि “शिक्षा केवल ज्ञान का संप्रेषण नहीं, बल्कि यह समाज की सांस्कृतिक चेतना, जीवन-मूल्यों और परंपराओं के संरक्षण का सशक्त माध्यम है।” उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनर्स्थापना और समाज के अनुकूल शिक्षा को ढालने की दिशा में एक साहसिक प्रयास बताया। डॉ. सिंह ने कहा कि यह नीति गुरुकुल परंपरा और वेद-उपनिषदों में निहित ज्ञान को आधुनिक संदर्भों में स्थापित करने का कार्य कर रही है। यह न केवल तकनीकी और व्यावसायिक कौशल देती है, बल्कि नैतिकता, संस्कृति और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति भी विद्यार्थियों को संवेदनशील बनाती है। उन्होंने शिक्षकों की भूमिका को नीति का सबसे मजबूत पक्ष बताते हुए कहा कि “नई नीति शिक्षकों को केवल ज्ञानदाता नहीं, बल्कि समाज के निर्माता और मार्गदर्शक के रूप में स्थापित करती है।” उन्होंने कहा कि शिक्षकों को अब नवाचार, अनुसंधान और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
कार्यक्रम के बीज वक्ता महाविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के पूर्व प्रोफेसर प्रो. ए.एन. राय ने भारत की शिक्षा नीतियों के ऐतिहासिक विकास का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। डॉ. राकेश पांडेय ने नीति के गुण-दोषों और इसके कार्यान्वयन से जुड़ी चुनौतियों पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. विलोक सिंह ने नीति के संभावित लाभों और व्यावहारिक समस्याओं का विवेचन किया।संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. वी.के. राय ने कहा कि “नई शिक्षा नीति भारतीय शिक्षा प्रणाली को आत्मनिर्भर बनाने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाने की दिशा में एक दूरदर्शी कदम है।” कार्यक्रम का संचालन एवं समन्वयन वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. प्रमोद कुमार अनंग ने किया। अतिथियों का स्वागत डॉ. रामधारी राम द्वारा एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. कृष्णानंद चतुर्वेदी द्वारा किया गया। इस संगोष्ठी में महाविद्यालय के सभी प्राध्यापकगण और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने प्रतिभाग किया।

