जमानियां (गाजीपुर)। कस्बा बनाए स्थित शाही जामा मस्जिद के सेक्रेटरी मौलाना तनवीर रजा ने जानकारी दी है कि इस्लामिक नया साल 1447 हिजरी की शुरुआत शुक्रवार, 27 जून से हो गई है। उन्होंने बताया कि मोहर्रम का चांद गुरुवार, 26 जून को देखा गया, जिसके चलते शुक्रवार को मोहर्रम की पहली तारीख मानी जा रही है। मौलाना तनवीर रजा ने बताया कि मोहर्रम इस्लाम के चार पवित्र महीनों में से एक है, जिनमें युद्ध या विवाद से बचने की सलाह दी जाती है। यह महीना शांति, इबादत और आत्म-निरीक्षण का समय माना जाता है। मोहर्रम की 10वीं तारीख को ‘रोज-ए-आशूरा’ कहा जाता है, जिसका इस्लाम में विशेष धार्मिक महत्व है। इस वर्ष आशूरा 6 जुलाई को मनाया जाएगा।
कर्बला के शहीदों को दी जाएगी श्रद्धांजलि
मौलाना तनवीर रजा ने बताया कि आशूरा के दिन इस्लाम धर्म के अंतिम पैगंबर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत को याद किया जाएगा, जो कर्बला की जंग में सत्य और धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे। उन्होंने कहा कि इस अवसर पर किसी तरह का उत्सव नहीं मनाया जाएगा। मुस्लिम महिलाएं अपने घरों में कुरान की तिलावत करेंगी और मुस्लिम युवक अखाड़ा एवं मातम के माध्यम से रस्में निभाएंगे।
हिजरी वर्ष की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस्लामी नया साल हिजरत की घटना को याद करता है, जब पैगंबर मोहम्मद ने मक्का से मदीना की ओर प्रवास किया था। यह केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि एक संगठित मुस्लिम समाज की नींव रखी गई थी। इस अवसर को ईद-उल-फित्र या ईद-उल-अजहा की तरह उत्सव के रूप में नहीं मनाया जाता, बल्कि यह आत्मचिंतन, दान और भक्ति के लिए समर्पित होता है।
शिया और सुन्नी समुदायों में अलग-अलग परंपराएं
हालांकि हिजरी नव वर्ष समस्त मुस्लिम समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन शिया और सुन्नी समुदाय इसे अलग-अलग तरीकों से मनाते हैं। शिया मुसलमान मोहर्रम के पहले दस दिनों को शोक की अवधि के रूप में मानते हैं और आशूरा के दिन काले कपड़े पहनकर मातम व ताज़िया जुलूस निकालते हैं। वहीं सुन्नी मुसलमान इस दिन रोजा रखकर हज़रत मूसा द्वारा लाल सागर पार करने की घटना को याद करते हैं।मौलाना तनवीर रजा ने अंत में कहा कि मोहर्रम का महीना नई शुरुआत और आध्यात्मिक संकल्पों को नवीनीकृत करने का अवसर है। यह समय भाईचारे, शांति और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश देता है।